जिसको हम सदा अपने पास नहीं रख सकते, उसकी इच्छा
करने से और उसको पाने से क्या लाभ।
जो दूसरों की सेवा नहीं करता और भगवान को याद नहीं करता, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी ही नहीं है।
अपने लिए सुख चाहने से नाशवान सुख मिलता है और दूसरों के को सुख पहुंचाने से अविनाशी सुख मिलता है।
विचार करो, क्या ये दिन सदा ऐसे ही रहेंगे।
चेत करो! यह संसार सदा रहने के लिए नहीं है। यहाँ केवल
मरने-ही-मरने वाले रहते हैं फिर पैर फैलाये कैसे बैठे हो ?
शिष्य दुर्लभ है, गुरू नहीं। सेवक दुर्लभ है, सेव्य नहीं। कज्ञासु
दुर्लभ है, ज्ञान नहीं। भक्त दुर्लभ है, भगवान नहीं।
संसार विश्वास करने योग्य नहीं है, प्रत्यत सेवा करने योग्य है।
जैसे मनुष्य शरीर बार-बार नहीं मिलता, ऐसे ही मनुष्य शरीर मिलने पर भी सत्संग बार-बार नहीं मिलता।
संसार का काम तो और कोई भी कर लेगा, पर अपने कल्याण का काम तो खुद को ही करना पड़ेगा, जैसे भोजन और दवाई
खुद को ही लेनी पड़ती है।
संसार के काम में तो नफा और नुकसान दोनों होते हैं, पर
भगवान के काम में नफा-ही-नफा होता है, नुकसान होता ही नहीं।
पारमार्थिक उन्नति करने वाले की लौकिक उन्नति स्वत: होती है।
कुछ भी लेने की इच्छा भयंकर दु:ख देने वाली है।
आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही
बुराई पैदा होगी। इसलिए अच्छे बनो, पर अच्छाई का अभिमान मत करो।
संकलनकर्ता
कन्हैया चौधरी, वृन्दावन, मथुरा
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